गूँगी गुड़िया
अनीता सैनी
शुक्रवार, अगस्त 29
धुँधलों से हरापन

शनिवार, अगस्त 23
कल्पना की चुप्पी
✍️ अनीता सैनी
...
और कुछ नहीं—
बस ठठा उठता है वह पल,
जब दरिद्र हो जाती है मेरी कल्पना,
मानो चेतना का स्रोत ही
क्षण भर में सूख गया हो।
शब्दों का अंबार होते हुए भी
विचार रिक्त खड़े रह जाते हैं—
जैसे मानो
मौन ही आखिरी सत्य बनकर
हर तर्क और हर अभिव्यक्ति को
अर्थहीन कर देता है।
मैं लिखना चाहूँ भी तो
शब्द ठिठक जाते हैं,
क्योंकि सामने तुम्हारा प्रतिबिंब है—
जो मेरे अल्प विचारों की सीमा को
छिन्न-भिन्न कर देता है,
और मेरे भावों को उस
अनन्त के सामने लज्जित कर देता है।
मेरी पंक्तियों में जितना समा पाता है,
उससे कहीं अधिक विराट
व्यथा का प्रतिबिंब
कल्पना के दर्पण में झलक उठता है—
जहाँ कोनों की कोरी चुप्पी
तुम्हारी प्रतीक्षा में
बिलखती रह जाती है।

शनिवार, जुलाई 12
धूल में छिपा समंदर

सोमवार, जून 30
छलावा

शुक्रवार, जून 20
दरकन

गुरुवार, जून 19
मीरा — एक अंतरध्वनि

रविवार, जून 1
कोख से कंठ तक

बुधवार, अप्रैल 23
स्मृति के छोर पर
२२ अप्रैल २०२५
….
अपने अस्तित्व से मुँह फेरने वाला व्यक्ति,
उस दिन
एक बार फिर जीवित हो उठता है,
जब वह धीरे-धीरे
अपने अब तक के, जिए जीवन को
भूलने लगता है।
उसे समझ होती है तो बस इतनी कि
धीरे-धीरे भूलना
और
अचानक सब कुछ भूल जाना —
इन दोनों में अंतर है।
एक जीवन है,
तो दूसरा मृत्यु।
उसे जीवन मिला है —
वह धीरे-धीरे स्वयं को भूल रहा है,
क्योंकि वह अब भी
भोर को ‘भोर’ के रूप में पहचानता है।
जब वह सुबह उठता है,
तो वह
सुबह को ‘सुबह’ के रूप में पहचानता है।
वह
‘न पहचान पाने’ की पीड़ा को भी पहचानता है।
वह दिन में नहीं सोता —
इस डर से नहीं कि रात को उठने पर
कहीं वह रात को
‘रात’ के रूप में पहचान न पाया तो,
बल्कि इसलिए
कि वह
दिन को ‘दिन’ के रूप में पहचानता है,
और स्वयं को पुकारता है
टूटती पहचान की अंतिम दीवार की तरह।

शनिवार, अप्रैल 19
नीरव सौंदर्य
१८अप्रैल २०२५
….
आश्वस्त करती
अनिश्चितताएँ जानती हैं!
घाटियों में आशंकाएँ नहीं पनपतीं;
वहाँ
मिथ्या की जड़ें
गहरी नहीं, अपितु कमजोर होती हैं।
वहाँ अंखुए फूटते हैं
उदासियों के।
जब उदासियाँ
घाटियों में बैठकर कविताएँ रचती हैं,
तब उनके पास
केवल चमकती हुई दिव्य आँखें ही नहीं होतीं,
अपार सौंदर्य भी होता है।
नाक, सौंदर्य का एक अनुपम उदाहरण है,
जिसकी रक्षा आँखें आजीवन करती हैं।
वे यूँ ही नहीं कहतीं—
"कविता प्यास है न हीं तृप्ति
बस
एक घूंट पानी है।"
